
विगत वर्ष की असीम सुभ कामनाओं, आशाओं को लेकर गत वर्ष के प्रथम प्रभात बेला मैं रवि किरणे सुभकामना, मंगलता, उत्तमता का संदेश लायें हम सब के जिन्दगी मैं..

विगत वर्ष की असीम सुभ कामनाओं, आशाओं को लेकर गत वर्ष के प्रथम प्रभात बेला मैं रवि किरणे सुभकामना, मंगलता, उत्तमता का संदेश लायें हम सब के जिन्दगी मैं..
Posted by Brijesh Thursday, January 1, 2009 at Thursday, January 01, 2009 0 comments Labels: अनुभव, चिन्तन, प्यार
पति के जन्मदिन पर पत्नी उन्हें तोहफा देती थी। वहीं पति भी पत्नी के जन्मदिन पर उसे तोहफा दिया करते थे। पत्नी गृहिणी थी। जाहिर था कि वह पति से ही पैसे लेकर अपनी पसंद के तोहफे उन्हें देती थी। तोहफे देते वक्त उसके मुंह से अनायास निकलता, लीजिए, मेरी तरफ से तोहफा!
पति सोचते, पत्नी मेरे ही पैसे से मुझे मेरे जन्मदिन पर तोहफे देती है तो उसे अपना क्यों बता देती है। एक बार पति के जन्मदिन पर पत्नी ने एक शर्ट पति को प्रेजेंट की और कहा, मेरी ओर से इसे कबूल कीजिए।
पति ने कहा, मैं तुम्हें तोहफा दूं या तुम मुझे तोहफा दो, बात तो एक ही है क्योंकि दोनों तोहफों में पैसा मेरा ही लगता है। फिर दोनों में फर्क क्या है?
पत्नी को बहुत बुरा लगा। वह पति के मन में छुपे भाव को ताड गई। उसने संयम दिखाते हुए कहा, तुम्हारे और मेरे तोहफे में स्वामित्व के लिहाज से कोई फर्क नहीं है।
मगर इस लिहाज से फर्क जरूर है कि जहां तुम्हारे तोहफे में पुरुषजन्य दर्प झलकता है वहीं मेरे तोहफे में प्रेम और विनम्रता होती है। ऐसा बेबाक जवाब सुनकर पति महोदय सकपका गए।
[ज्ञानदेव मुकेश]
Posted by Brijesh Monday, July 21, 2008 at Monday, July 21, 2008 0 comments Labels: अनुभव, कहानी, चिन्तन, धर्मं, प्यार, रचनाकर्म, सृजन
आजकल मुन्ना भाई पर धुन सवार है कि वो भी भाईगिरी छोडकर चैनल वाले बाबाओं की तरह प्रवचन देना, कथा करना शुरू करेगा और उसने सर्किट से वादा किया है कि वो केवल प्रवचन करेगा, लाईट, टेंट, माइक का ठेका अन्य बाबाओं की तरह खुद नहीं लेगा बल्कि सारे ठेके सर्किट को देगा। मुन्नाभाई ने दीपावली से कथा करने का निर्णय लिया है। फिलहाल वे अपने प्रवचन का पहला प्रहार सर्किट पर कर रहे हैं- तो इति सम्प्रति वार्ता शूयन्ताम।)
अे सर्किट! तेरे को पता है ना कि रामजी कौन थे?
अे भाय! कइसा बहकी-बहकी बात कर रेले हो अपुन राम को जानता तो नेता-वेता नई होता बाप! अपुन को इतना इच पता है कि रामजी अपुन का कंट्री में पैदा हुयेले थे। इसके आगे पूछना हो तो खुद रामजी से पूछना या फिर गोरमेंट से, अपुन सॉरी बोलता भाय!
अरे नई रे, तेरे नालिज के आगे तो अपुन कान पकडता है। तेरे को कम से कम ये तो पता है कि राम जी अपने इच कंट्री में पैदा हुयेले थे। तेरे नालिज के वास्ते अपुन तेरे को अभी इच नोबल प्राइज देता, पर ये अभी अपुन के हाथ में नई है रेऽऽऽ
कोई बात नहीं भायऽऽ, हाथ में आ जाये तब देना। अभी तो रात को आक्खा शहर का शटर डाउन होयेंगा। पर हां.. भाय.. ये तुम रामजी का बात किया तो अपुन थोडा इमोशनल हो गया भाय। अपुन को रामजी का थोडा बैक ग्राउन्ड हिस्ट्री बताओ ना भाय तुम तो सीधा गांधी जी के टच में हो वो भी आक्खा लाइफ एक इच सोंग सिंगते रहे- रघुपति राघव राजा राम।
वो अपुन को राम जी के बारे में गांधी जी ही ब्रीफ कियेले थे- बोले तो, राम जी अयोध्या के किंग के प्रिंस थे। फिर बोले तो रामजी के फादर ने अपना सैकण्ड वाइफ को कुछ जुबान दियेले थें, इसी जुबान के चक्कर में रामजी फोरेस्ट टू फोरेस्ट घूमे। फोरेस्ट में रावण ने रामजी की वाईफ को हाइजैक (यहां मुन्नाभाई का तात्पर्य अपहरण से है) कर लिया और उनको अशोका गॉर्डन (यहां इनका तात्पर्य अशोक वाटिका से रहा होगा) ले गया। फिर राम जी ने रावण के आक्खा खानदान की वाट लगा दी और फिर बोले तो रावण को खलास कर दिया फिर वो वापस अपने देश आ गये और आक्खा इंडिया ने दीवाली मना डाली।
क्या बोल रेले हो भायऽऽ। ये लक्ष्मी जी कौन है भाय? क्या ये रामजी से भी पॉवरफुल है?
ये सब पइसे का चक्कर है रे सर्किट। पइसा-पइसा-पइसा, जब अंटी में हो पइसा, तो फिर राम कइसा। अभी लक्ष्मी बोले तो- पइसा, रोकडा, पेटी, खोखा- ये बहुत चंचल है रे। हसबैण्ड बोले तो- बोले तो, विष्णुजी- वेरी स्मार्ट, पॉवरफुल रोकडे वाला.. पर ये लक्ष्मी आंटी ना उनके पास भी टिकती इच किधर है।
अे भाय!- ये केलकुलेशन अपुन के समझ में नहीं आया, हसबैण्ड इतना स्मार्ट, इतना पावरफुल है तो ये साथ काय को नहीं रहेली है?
तू भी पकिया के माफक पक गयेला है रेऽऽ, अपुन को गांधी जी ने रहीम जी का एक शेर सुनाया। लक्ष्मी जी के बारे में। शेर तो अपुन को पूरा याद नई रे-पन.. बोले तो-
कमला स्टेबल नहीं, बोले तो ये इच जानता सब कोय।
ये पुरुष पुरातन का वाइफ है, बोले तो क्यों न चंचल होय॥
वाह भाय वाह.. क्या शेर मारा है.. इसका मीनिंग बोले तो- ?
बोले तो.. जइसे ये वो इच कमला के माफिक है, जिसको हर कोई छतरी के नीचे बुलाने को मांगता, कोई घर बुलाने का मांगता, कोई आफिस, कोई तिजोरी में, कोई गल्ले में। दूसरा- ये कमला; बोले तो लक्ष्मी स्टेबल नहीं है रेऽ, एक जगह टिकती इच नहीं, और इसका पुरुष यानी हसबैण्ड बहुत पुराना है रे इसी वास्ते ये बहुत चंचल है, जैसे, अपुन का चिंकी (यहां उनका आशय उनकी गर्लफ्रेन्ड से है), तेरा जीभ, बोले तो फुल टाइम लपर-लपर करेली है और ये बाटली (शास्त्रों में भी लक्ष्मी, स्त्री, जिह्वा व मदिरा को चंचला कहा गया है)
अे भाय! लोग लक्ष्मी को कइसे-कइसे इनवाइट करते हैं और ये एन्ट्री कैसे करती है?
अे सर्किट! लक्ष्मी आंटी को लोग दो तरह से इनवाइट करता इच है पहला- गांधी से दूसरा- दादागिरी से।
अे भाय। थोडा खुल के बोलो ना भाय।
अरे गांधीगिरी बोले तो अहिंसा से, उसका तारीफ करके, उसको मसका मारके- बोले तो- अे लक्ष्मी माई तुम गोल्ड के माफक पीली, चंद्रमा के माफिक व्हाइट-झक्कास, चांदी की माला पहनेली, हिरणी का टाइप चंचल, तुम अपुन के घर आओ।
(ॐ हिरण्यवर्णारिणीं सुवर्ण रजत स्त्रजाम चंद्रा हिरण्य मयीं लक्ष्मी जात वेदो म आ वह) श्री सूक्तम्
दूसरा बहुत सॉलिड तरीका है रे सर्किट, भाई लोगों वाला लक्ष्मी के बेटे किसी सेठ का भेजे में बंदूक रखने का, घोडा पे अंगुली रखने का, लक्ष्मी रनिंग करता हुआ तुम्हारे पास आयेंगा। दीवाली के दिन लक्ष्मी को बुलाने का फार्मूला आउट डेटेड टाइप के लोगों का हय रे। एक और बिन्दास तरीका है, लक्ष्मी जी के ड्राइवर कम व्हीकल यानि उल्लू की कनपटी पे घोडा तानो, लक्ष्मी जी अगर अहमदाबाद जा रेली होयेंगी तो दिल्ली का रूट पकड लेंगी।
अे भाय! वो एन्ट्री वाली बात?
वो इच बता रेला हूं रे.. इसका एन्ट्री बहुत धमाकेदार बहुत ब्लास्टिंग होता। किदर से भी एन्ट्री करना इसका पुराना स्टाइल है रे। अभी ये रात को बारा बजे दीवार फांदकर आये या खिडकी तोडकर ये इसका मरजी है। ये टेबल के नीचे से आये या टिफिन के अंदर से, डर से आये या टेण्डर से, गोली से आये या बोली से टोटली उस पर डिपेण्ड करता है। और ये दो कलर को बहुत लव करती है- ब्लैक एंड व्हाइट-बोले तो, गोरी और काली। अपुन इंडियन लोगों को काली लक्ष्मी जी बहुत स्मार्ट लगती है-बोले तो ब्लैक ब्यूटी और मनी-व्हेरी चार्मिग।
अे भाय ये ब्लैक लक्ष्मी- व्हाइट कैसे होती है?
जब ये साधु-बाबाओं के पास जाती है। इदर ये बाबा लोग बहुत पॉवर फुल है.. इनका खोली में कोयला घुसता है, दूध बाहर निकलता है। इदर आदमी लंगोट लगाकर आता है, लुंगी लगाकर जाता है। वो आरती नहीं सुना.. सब संभव हो जाता मन नहीं घबराता- बोले तो-जै लक्ष्मी माता।
Posted by Brijesh Tuesday, June 3, 2008 at Tuesday, June 03, 2008 2 comments Labels: अनुभव, कहानी, चिन्तन, सृजन
Posted by Brijesh Saturday, May 17, 2008 at Saturday, May 17, 2008 1 comments Labels: अनुभव, चिन्तन, प्यार, सृजन
एक दिन मिल गयी वो मुझे
गली के एक मोड़ पर
बिखरे उलझे केश, चेहरे पर झुर्रिया.
झुकी कमर और हाथ में लाठी !!!
पूंछ ही लिया मैंने……….. कोन हो तुम
हिचकती, हक्लाती वो बोली
बेटा नही पहचानता मुझे……..
में हिन्दी हू तुम्हारी माँ,
मैंने सबको अपने में समाया,
पर… तुम्ही ने नही अपनाया मुझे
में जहा कल थी , आज वो है………….
शर्म से झुक गयी मेरी आँखे,
पता नही कहा चली गयी मेरी आवाज,
और जब नज़रे उठी तो सामने कोई नही था,
था तो केवल शून्य, केवल शून्य…………॥!!!!!
जून की गर्म दोपहरी में तीन आदमी सड़क के किनारे गङ्ढा खोद रहे थे। उनका बॉस पास ही पेड़ की छाया में खड़ा था। एक आदमी बोला -
''देखो, हम यहां धूप में मर रहे हैं और हमारा अफसर छाया में आराम से खड़ा है। ये अन्याय क्यों हैं ?''''
पता नहीं।'' - दूसरे ने कहा ।
''मैं पूछकर आता हूं'' - पहले ने कहा
और अफसर के पास गया।
''हम लोग धूप में काम कर रहे हैं और आप यहां छाया में खड़े हैं। ऐसा क्यों है? - उसने पूछा।
''अक्ल की वजह से'' - अफसर ने कहा ।
''क्या मतलब ? '' - आदमी ने पूछा।
''मतलब ये कि मैं तुमसे ज्यादा अक्लमंद हूं ।'' - अफसर ने कहा। ''वो कैसे ? साबित कीजिये'' आदमी ने कहा। ''ठीक है ।
देखो मैं अपना हाथ इस पेड़ पर टिकाता हूं। अब तुम फावड़ा मेरे हाथ पर मारो।'' - अफसर ने कहा।
आदमी ने जैसे ही उसके हाथ पर वार किया अफसर ने अपना हाथ वहां से हटा लिया। फावड़ा तने में जाकर लगा।
''यही अक्लमंदी है। समझे ?'' - अफसर ने मुस्कराते हुये कहा।
आदमी सर झुकाये वापस चला गया। उसके साथी ने पूछा - ''उन्होंने क्या कहा ?''''
उन्होंने कहा हम लोगों में अक्ल कम हैं इसीलिये हम यहां हैं।''
''क्या मतलब? अक्ल कम है !'' - साथी ने पूछा ।
आदमी ने सिर खुजाया और अपने दूसरे साथी के सिर पर हाथ रखकर तीसरे से कहा - ''फावड़ा उठाओ और मेरे हाथ पर मारो।''
Posted by विप्र Tuesday, September 18, 2007 at Tuesday, September 18, 2007 0 comments Labels: चिन्तन
हिंदी तेरे दर्द की, किसे यहाँ परवाह,
एक अंग्रेजी साल, एक हिंदी सप्ताह
धड़कन मैं इंग्लेंड हैं, मुँह पर हिंदुस्तान,
ऐसे मैं हो किस तरह, हिंदी का उत्थान
निज भाषा, निज राष्ट , निज संसकृत से परहेज,
गोरों कि आगे हुए, हम काले अंग्रेज
स्वाभिमान को बेचकर, जारी जिनके जश्न,
हैं फिजूल उनके लिए, निज भाषा का प्रस्न
अंग्रेजी के मोह मैं खोई निज पहचान,
घर के रहे, न घाट के, हम धोबी के श्वान
दिल्ली तेरे न्याय पर, कैसे हो विश्वास,
अंग्रेजी को राजसुख, हिंदी को बनवास
भाषा-संसकृत से रहा, यदि यूँ ही बिद्वेष,
आने वाली पीढियॉ, ढूँडेगी अवशेष
हिंदी का खाकर गुने, जो अंग्रेजी गीत,
हे प्रभु ! सौ दुश्मन मिले, मिले न ऐसा मीत
Posted by Brijesh Friday, September 14, 2007 at Friday, September 14, 2007 0 comments Labels: चिन्तन
चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका
मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये
मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इन्जन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन
किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया
श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया
वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।
कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके
खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों
दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है
दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अन्जाम लिखा है?
किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया ।
जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े
निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।
घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा
जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने
बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे
कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया
किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया
आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण !
जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला !
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।
- श्यामनन्दन किशोर
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
वतन के फकीरो का फेरा हुआ है।।
उठो अब निराशा निशा खो रही है
सुनहली-सी पूरब दिशा हो रही है
उषा की किरण जगमगी हो रही है
विहंगों की ध्वनि नींद तम धो रही है
तुम्हें किसलिए मोह घेरा हुआ है
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।।
उठो बूढ़ों बच्चों वतन दान माँगो
जवानों नई ज़िंदगी ज्ञान माँगो
पड़े किसलिए देश उत्थान माँगो
शहीदों से भारत का अभिमान माँगो
घरों में दिलों में उजाला हुआ है।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
उठो देवियों वक्त खोने न दो तुम
जगे तो उन्हें फिर से सोने न दो तुम
कोई फूट के बीज बोने न दो तुम
कहीं देश अपमान होने न दो तुम
घडी शुभ महूरत का फेरा हुआ है।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
हवा क्रांति की आ रही ले उजाली
बदल जाने वाली है शासन प्रणाली
जगो देख लो मस्त फूलों की डाली
सितारे भगे आ रहा अंशुमाली
दरख़्तों पे चिड़ियों का फेरा हुआ है।
उठो सोने वालों सबेरा हुआ है।
-वंशीधर शुक्ल
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
दीवारों पर चढ़ती है सौ बार फिसलती है 
मन का विश्वास रगों में सहस भरता है
गिरकर चढ़ना, चढ़कर गिरना नहीं अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों कि हार नहीं होती
दुब्कियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा-जाकर खाली हाथ लौट आता है
सहज नहीं मोती पाना गहरे पानी में
दूना होता उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हरबार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो
कहा कमी रह गयी, देखो और सुधार करो
संघर्सों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
जबतक सफलता ना मिले नींद को त्यागो तुम
कुछ किये बिना ही जय-जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
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