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Love Code

#include
#include
#define Cute beautiful_lady

void main()
{
goto college;
scanf("100%",&ladies);

if(lady ==Cute)
line++;
while( !reply )
{

printf("I Love U");

scanf("100%",&reply);

}

if(reply == "GAALI")
main(); /* go back and repeat the process */

else if(reply == "SANDAL ")
exit(1);



else if(reply == "I Love U")
{
lover =Cute ;
love = (heart*)malloc(sizeof(lover));
}

goto restaurant;

restaurant:
{
food++;
smile++;
pay->money = lover->money;
return(college);
}

if(time==2.30)
goto cinema;

cinema:
{
watch++;
if(intermission)
{
coke++;
Popecorn++;

}
}

if(time ==6.00)
goto park;
}
}
{
for(time=6.30;time<= 8.30;time+=0.001)
kiss = kiss+1;
}
free(lover);
return(home);
getch();
}

फर्क

पति के जन्मदिन पर पत्नी उन्हें तोहफा देती थी। वहीं पति भी पत्नी के जन्मदिन पर उसे तोहफा दिया करते थे। पत्नी गृहिणी थी। जाहिर था कि वह पति से ही पैसे लेकर अपनी पसंद के तोहफे उन्हें देती थी। तोहफे देते वक्त उसके मुंह से अनायास निकलता, लीजिए, मेरी तरफ से तोहफा!

पति सोचते, पत्नी मेरे ही पैसे से मुझे मेरे जन्मदिन पर तोहफे देती है तो उसे अपना क्यों बता देती है। एक बार पति के जन्मदिन पर पत्नी ने एक शर्ट पति को प्रेजेंट की और कहा, मेरी ओर से इसे कबूल कीजिए।

पति ने कहा, मैं तुम्हें तोहफा दूं या तुम मुझे तोहफा दो, बात तो एक ही है क्योंकि दोनों तोहफों में पैसा मेरा ही लगता है। फिर दोनों में फर्क क्या है?

पत्नी को बहुत बुरा लगा। वह पति के मन में छुपे भाव को ताड गई। उसने संयम दिखाते हुए कहा, तुम्हारे और मेरे तोहफे में स्वामित्व के लिहाज से कोई फर्क नहीं है।

मगर इस लिहाज से फर्क जरूर है कि जहां तुम्हारे तोहफे में पुरुषजन्य दर्प झलकता है वहीं मेरे तोहफे में प्रेम और विनम्रता होती है। ऐसा बेबाक जवाब सुनकर पति महोदय सकपका गए।

[ज्ञानदेव मुकेश]

शादी की दास्तान

अभी शादी का पहला ही साल था,
खुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,
खुशियाँ कुछ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभल रही थी,

सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शरमाते हुए हमे नींद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हमारे बालों में फिरना,
मुस्कुराते हुए कहना की डार्लिंग चाय तो पी लो,
जल्दी से रेडी हो जाओ, आप को ऑफिस भी है जाना.

घरवाली भगवन का रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग पर पूरी तरह छाई थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था.

*5 साल बाद*

सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना,
टेबल पर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,
आज ऑफिस जाओ तो मुन्ना को स्कूल छोड़ते हुए जाना.

एक बार फिर वोही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर ख़ुद ही संभाल लेना.

न जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग पर काली घटा छाई थी,
साँस भी लेते है तो उनी का ख्याल होता है,
हर समय ज़हन में एक ही सवाल होता है,
क्या कभी वो दिन लौट के आएंगे,
हम एक बार फिर कुवारें बन पाएंगे.

अथ दीवाली गाथा

आजकल मुन्ना भाई पर धुन सवार है कि वो भी भाईगिरी छोडकर चैनल वाले बाबाओं की तरह प्रवचन देना, कथा करना शुरू करेगा और उसने सर्किट से वादा किया है कि वो केवल प्रवचन करेगा, लाईट, टेंट, माइक का ठेका अन्य बाबाओं की तरह खुद नहीं लेगा बल्कि सारे ठेके सर्किट को देगा। मुन्नाभाई ने दीपावली से कथा करने का निर्णय लिया है। फिलहाल वे अपने प्रवचन का पहला प्रहार सर्किट पर कर रहे हैं- तो इति सम्प्रति वार्ता शूयन्ताम।)

अे सर्किट! तेरे को पता है ना कि रामजी कौन थे?
अे भाय! कइसा बहकी-बहकी बात कर रेले हो अपुन राम को जानता तो नेता-वेता नई होता बाप! अपुन को इतना इच पता है कि रामजी अपुन का कंट्री में पैदा हुयेले थे। इसके आगे पूछना हो तो खुद रामजी से पूछना या फिर गोरमेंट से, अपुन सॉरी बोलता भाय!
अरे नई रे, तेरे नालिज के आगे तो अपुन कान पकडता है। तेरे को कम से कम ये तो पता है कि राम जी अपने इच कंट्री में पैदा हुयेले थे। तेरे नालिज के वास्ते अपुन तेरे को अभी इच नोबल प्राइज देता, पर ये अभी अपुन के हाथ में नई है रेऽऽऽ
कोई बात नहीं भायऽऽ, हाथ में आ जाये तब देना। अभी तो रात को आक्खा शहर का शटर डाउन होयेंगा। पर हां.. भाय.. ये तुम रामजी का बात किया तो अपुन थोडा इमोशनल हो गया भाय। अपुन को रामजी का थोडा बैक ग्राउन्ड हिस्ट्री बताओ ना भाय तुम तो सीधा गांधी जी के टच में हो वो भी आक्खा लाइफ एक इच सोंग सिंगते रहे- रघुपति राघव राजा राम।
वो अपुन को राम जी के बारे में गांधी जी ही ब्रीफ कियेले थे- बोले तो, राम जी अयोध्या के किंग के प्रिंस थे। फिर बोले तो रामजी के फादर ने अपना सैकण्ड वाइफ को कुछ जुबान दियेले थें, इसी जुबान के चक्कर में रामजी फोरेस्ट टू फोरेस्ट घूमे। फोरेस्ट में रावण ने रामजी की वाईफ को हाइजैक (यहां मुन्नाभाई का तात्पर्य अपहरण से है) कर लिया और उनको अशोका गॉर्डन (यहां इनका तात्पर्य अशोक वाटिका से रहा होगा) ले गया। फिर राम जी ने रावण के आक्खा खानदान की वाट लगा दी और फिर बोले तो रावण को खलास कर दिया फिर वो वापस अपने देश आ गये और आक्खा इंडिया ने दीवाली मना डाली।
क्या बोल रेले हो भायऽऽ। ये लक्ष्मी जी कौन है भाय? क्या ये रामजी से भी पॉवरफुल है?
ये सब पइसे का चक्कर है रे सर्किट। पइसा-पइसा-पइसा, जब अंटी में हो पइसा, तो फिर राम कइसा। अभी लक्ष्मी बोले तो- पइसा, रोकडा, पेटी, खोखा- ये बहुत चंचल है रे। हसबैण्ड बोले तो- बोले तो, विष्णुजी- वेरी स्मार्ट, पॉवरफुल रोकडे वाला.. पर ये लक्ष्मी आंटी ना उनके पास भी टिकती इच किधर है।
अे भाय!- ये केलकुलेशन अपुन के समझ में नहीं आया, हसबैण्ड इतना स्मार्ट, इतना पावरफुल है तो ये साथ काय को नहीं रहेली है?
तू भी पकिया के माफक पक गयेला है रेऽऽ, अपुन को गांधी जी ने रहीम जी का एक शेर सुनाया। लक्ष्मी जी के बारे में। शेर तो अपुन को पूरा याद नई रे-पन.. बोले तो-
कमला स्टेबल नहीं, बोले तो ये इच जानता सब कोय।
ये पुरुष पुरातन का वाइफ है, बोले तो क्यों न चंचल होय॥
वाह भाय वाह.. क्या शेर मारा है.. इसका मीनिंग बोले तो- ?
बोले तो.. जइसे ये वो इच कमला के माफिक है, जिसको हर कोई छतरी के नीचे बुलाने को मांगता, कोई घर बुलाने का मांगता, कोई आफिस, कोई तिजोरी में, कोई गल्ले में। दूसरा- ये कमला; बोले तो लक्ष्मी स्टेबल नहीं है रेऽ, एक जगह टिकती इच नहीं, और इसका पुरुष यानी हसबैण्ड बहुत पुराना है रे इसी वास्ते ये बहुत चंचल है, जैसे, अपुन का चिंकी (यहां उनका आशय उनकी गर्लफ्रेन्ड से है), तेरा जीभ, बोले तो फुल टाइम लपर-लपर करेली है और ये बाटली (शास्त्रों में भी लक्ष्मी, स्त्री, जिह्वा व मदिरा को चंचला कहा गया है)
अे भाय! लोग लक्ष्मी को कइसे-कइसे इनवाइट करते हैं और ये एन्ट्री कैसे करती है?
अे सर्किट! लक्ष्मी आंटी को लोग दो तरह से इनवाइट करता इच है पहला- गांधी से दूसरा- दादागिरी से।
अे भाय। थोडा खुल के बोलो ना भाय।
अरे गांधीगिरी बोले तो अहिंसा से, उसका तारीफ करके, उसको मसका मारके- बोले तो- अे लक्ष्मी माई तुम गोल्ड के माफक पीली, चंद्रमा के माफिक व्हाइट-झक्कास, चांदी की माला पहनेली, हिरणी का टाइप चंचल, तुम अपुन के घर आओ।
(ॐ हिरण्यवर्णारिणीं सुवर्ण रजत स्त्रजाम चंद्रा हिरण्य मयीं लक्ष्मी जात वेदो म आ वह) श्री सूक्तम्
दूसरा बहुत सॉलिड तरीका है रे सर्किट, भाई लोगों वाला लक्ष्मी के बेटे किसी सेठ का भेजे में बंदूक रखने का, घोडा पे अंगुली रखने का, लक्ष्मी रनिंग करता हुआ तुम्हारे पास आयेंगा। दीवाली के दिन लक्ष्मी को बुलाने का फार्मूला आउट डेटेड टाइप के लोगों का हय रे। एक और बिन्दास तरीका है, लक्ष्मी जी के ड्राइवर कम व्हीकल यानि उल्लू की कनपटी पे घोडा तानो, लक्ष्मी जी अगर अहमदाबाद जा रेली होयेंगी तो दिल्ली का रूट पकड लेंगी।
अे भाय! वो एन्ट्री वाली बात?
वो इच बता रेला हूं रे.. इसका एन्ट्री बहुत धमाकेदार बहुत ब्लास्टिंग होता। किदर से भी एन्ट्री करना इसका पुराना स्टाइल है रे। अभी ये रात को बारा बजे दीवार फांदकर आये या खिडकी तोडकर ये इसका मरजी है। ये टेबल के नीचे से आये या टिफिन के अंदर से, डर से आये या टेण्डर से, गोली से आये या बोली से टोटली उस पर डिपेण्ड करता है। और ये दो कलर को बहुत लव करती है- ब्लैक एंड व्हाइट-बोले तो, गोरी और काली। अपुन इंडियन लोगों को काली लक्ष्मी जी बहुत स्मार्ट लगती है-बोले तो ब्लैक ब्यूटी और मनी-व्हेरी चार्मिग।
अे भाय ये ब्लैक लक्ष्मी- व्हाइट कैसे होती है?
जब ये साधु-बाबाओं के पास जाती है। इदर ये बाबा लोग बहुत पॉवर फुल है.. इनका खोली में कोयला घुसता है, दूध बाहर निकलता है। इदर आदमी लंगोट लगाकर आता है, लुंगी लगाकर जाता है। वो आरती नहीं सुना.. सब संभव हो जाता मन नहीं घबराता- बोले तो-जै लक्ष्मी माता।

Tears

How do you fight tears?
Tears of sorrow and pain;
Tears of loss not gain,
Tears which follow no rules.

How do you fight tears?
And put on an act,
When you know it's a fact;
That you can't fight tears...

सप्ताह के 7 दिनों का धार्मिक महत्व

प्राचीनकाल से सप्ताह के सातों दिन, किसी न किसी खास देवी या देवता को समर्पित हैं। उनमें देवी-देवताओं के पूजन का विधान इस प्रकार है :

सोमवार
इस दिन रजतपात्र या ताम्रपात्र में गंगाजल और दुग्ध मिश्रित जल भगवान शिव को अर्पण करें तथा शिवलिंग पर आक के फूल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, चंदन आदि समर्पित करें। ध्यान रखें शिवजी को रोली नहीं चढाई जाती है।

आहार : दूध और इससे बनी चीजें दही, श्रीखंड, खोये के पेडे, बर्फी आदि ग्रहण करें। साथ ही आप केला, सेब, अमरूद, चीकू आदि का भी सेवन कर सकते हैं।

पूजन व जप : चंदन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से विधिवत श्री शिवजी का पूजन करके रुद्रसूक्त, शिवमहिम्न स्त्रोत, शिव चालीसा आदि का पाठ करें और ॐ नम: शिवाय मंत्र का जप करें।

वस्त्र : मोतिया या हलके भूरे रंग के वस्त्र धारण करें। कुंआरी कन्याएं श्रेष्ठ पति की प्राप्ति के लिए और विवाहिताएं दांपत्य जीवन की मधुरता बनाए रखने के लिए यह व्रत रखें।

मंगलवार
इस दिन तांबे या रजत पात्र में गंगाजल या शुद्ध सुगंधित जल लेकर, उससे हनुमान जी को स्नान कराएं। इसके अलावा चमेली के तेल या गाय के घी में सिंदूर मिलाकर और सिंदूरी अथवा भगवा रंग के वस्त्र उन्हें चढाएं। गुड, चना, चूरमा, लड्डू व बूंदी अर्पण करें।

आहार : दूध, दही, पनीर, श्रीखंड, अन्नरहित मिष्ठान और फल ले सकते हैं।

पूजन व जप : गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से हनुमान जी का पूजन करें और ॐ हं हनुमते नम: अथवा हनुमत् द्वादश नामों का स्मरण और हनुमान चालीसा पाठ करें।

वस्त्र : सिंदूरी लाल रंग के वस्त्र धारण करें।

बुधवार
रजत या ताम्र पात्र में गंगाजल व केवडा आदि से सुगंधित पदार्थयुक्त जल गणेश जी को अर्पित करें। साथ ही ऋद्धि-सिद्धि एवं शुभ-लाभ का भी पूजन करें। गणेश जी को हरी दूब अर्पण करने से इष्ट सिद्धि, मनोरथ प्राप्ति तथा वंश वृद्धि होती है।

पूजन व जप : गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से श्री गणपति का पूजन करें और ॐ श्री गणेशाय नम: मंत्र का जाप करें।

वस्त्र : आहार के रूप में दूध और इससे बने पदार्थो का प्रयोग करें तथा फल भी ग्रहण कर सकते हैं।

वस्त्र : मोतिया, हरा या श्वेत वस्त्र धारण करें।

बृहस्पतिवार
इस दिन रजत या ताम्र पात्र में शुद्ध जल या गंगाजल, गुलाबजल, केवडा व इत्र आदि मिश्रित जल भगवान विष्णु को अर्पण करें। अगर भगवान की प्रतिमा न हो तो केले के पेड की पूजा करें।

आहार : दूध, दही, मिष्ठान, फल आदि ग्रहण करें। केला इस दिन नहीं खाएं।

पूजन व जप : गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से भगवान लक्ष्मीनारायण अथवा श्री विष्णु की मूर्ति की पूजा करें तथा ॐ विष्णवे नम: अथवा ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम पाठ भी शुभ फलदायी सिद्ध होता है।

आहार : पीले रंग के वस्त्र धारण करें ।

शुक्रवार
इस दिन रजत या ताम्र पात्र में शुद्ध जल या गंगाजल, गुलाब जल श्री लक्ष्मी जी को अर्पण करके गंध, अक्षत, पुष्प, दीप नैवेद्य से विधिवत पूजन करें। इसी दिन मां संतोषी का व्रत एवं वैभव लक्ष्मी व्रत भी किया जाता है।

आहार : शुक्रवार को खटाई न तो खाएं और न ही स्पर्श करें। दूध, फल, गुड, चना व बेसन से निर्मित पकवानों को ग्रहण करें।

जप : ॐ श्री महालक्ष्म्यैनम:, ॐ श्री वैभवलक्ष्म्यैनम: मंत्रों का जाप करें। श्री सूक्त, लक्ष्मी सूक्त आदि स्त्रोतों का पाठ करें।

वस्त्र : लाल, गुलाबी या भूरे रंग के वस्त्र धारण करें।

शनिवार
इस दिन ग्रहों की प्रसन्नता के लिए नवग्रहों का गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजन, जप, दान, तर्पण आदि करना चाहिए। विशेष रूप से शनिवार शनिग्रह के लिए पूजनादि का उपयुक्त दिन है। पूजन के पश्चात नवग्रहों को तेल, सिंदूर, उडद, दही आदि अर्पण करें। इस दिन शनिग्रह की शांति के लिए सरसों के तेल का दान करें।

आहार : तेल व बेसन निर्मित पदार्थो को ग्रहण करें तथा दुग्ध, फल आदि ग्रहण करें।

जप : इस दिन शनि प्रतिमा पर सरसों का तेल व सिंदूर चढाकर ॐ शनिदेवाय नम: या ॐ शनै: शनिश्चराय नम: मंत्र का जाप करें।

वस्त्र : नीले या आसमानी वस्त्र धारण करें।

रविवार
इस दिन तांबे के पात्र में गंगाजल, रोली, शक्कर मिले हुए जल से भगवान् सूर्य को अ‌र्घ्य प्रदान करें। गंध, अक्षत, पुष्प, दीप, नैवेद्य से पूजा करें। सूर्य मंत्र का जाप करें। सूर्य के विभिन्न नामों का स्मरण करते हुए सूर्य नमस्कार करें। सूर्य सूक्त का पाठ करें।

आहार : इस दिन केवल मीठा भोजन जैसे - खीर, दूध, हलवा, फल आदि ग्रहण करें।

जप : ॐ घृणि: सूर्यायनम: मंत्र का जाप करें। आदित्यहृदय स्त्रोत का पाठ करें। गायत्री मंत्र का जाप और यदि संभव हो तो हवन करें।

वस्त्र : इस दिन हलके लाल या भूरे रंग के वस्त्र धारण करें।

नोट : सप्ताह के सातों दिनों के लिए वस्त्रों के जो रंग बताए गए हैं, अगर किसी कारणवश आप उस दिन बताए गए खास रंग का वस्त्र धारण न कर सकें तो अपने पास उस रंग का रूमाल या फूल रखें।

सारे कमरे बांट लिए ..



सारे कमरे बांट लिए हैं बेटों ने बटवारे में।
अब्बा-अम्मा का बिस्तर अब लगता है ओसारे में॥

बिजली के बिल की तानें तो बन कर कहर टूटती हैं।
रातें उनकी जगते-जगते कटती हैं अंधियारे में॥

बेटों के सर बीवी-बच्चों की भी जिम्मेदारी है।
किसको फुर्सत सोचे अम्मा-अब्बा जी के बारे में॥

जाने कितने राज छुपे हैं दिल के कोनों-खदरों में।
जाने कितने दर्द बह गए हैं आंसू के धारे में॥

शाहिद अब तो घर के ऊपर उनका ही अधिकार नहीं।
जिनका खून-पसीना शामिल है इस घर के गारे में॥


शाहिद वारसी

क्या लिखूँ..??

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..

कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ..
मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ..

वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..
वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ..

सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..
मै तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का ऐहसास लिखूँ..

वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ..
सावन की बारिश मेँ भीगूँ या मैं आंखों की बरसात लिखूँ..

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..

जब कभी मिलते है उनसे

जब कभी मिलते है उनसे, तो लगता है
हम अपनी कही कोई हुई ख़ुशी से मिलते है

सर को रख लेते है उनके दर पर " ख्वाइश "
हम उनसे इतनी दीवानगी से मिलते है

जब कभी जुदा होते है हम उनसे
कोई होश न ही कोई सुकून मिलता है
समझलो जैसे हम अपनी आवारगी से मिलते है

हमें नही कोई शौक महफिलो में रहने का
हम तो उनके साथ मिले पल, भीड़ से दूर,
जहाँ सिर्फ वह और हम रहे,
यूह समझलो बड़ी सादगी से मिलते है

वह जब साथ होते है अपने,
रौनके ढूँढ़ते है चेहरों पर,
जिस किसी आदमी से मिलते है

इश्क कि खुमारी, इश्क करने वाले समझे
हमें तो यही लगता है, रात कि तन्हाई में
आसमान के तारे भी अपने ज़मीन से मिलते है

गुमसुम सा हो जाता हूँ तनहा मैं
जो वह मिलते है तो लगता है
हम अपनी खोई हुई हस्ती से मिलते है

जब भी मिलते है उनसे तो अपनी,
हर सांस ,हर लफ्ज़, हर ख्वाइश,
हर कदम, हर धड़कन, हर आरजू, हर दुआ
लगता है हमें, कुबूल हो गयी हो जैसे,
उन्हें मिलके होता है यह एहसास जैसे
हम अपनी ज़िंदगी से मिलते है

लड़की, भाभी या मां?

मेरी समझ में नहीं आता कि मैं तुम्हें क्या कहूं
लड़की, भाभी या मां?
क्योंकि पहली बार तुम्हें उस समय देखा
जब मां ने मुझे भेजा था
भइया के लिए लड़की देखने
तब तुम लगी थीं एक अच्छी लड़की
दूसरी बार उस समय देखा
जब भइया के साथ विदा होकर
घर आई थीं तुम
तब एक अच्छी सी भाभी नजर आई थीं
आज देख रही हूं, तीसरी बार
जब तुमने एक बेटी को दिया है जन्म
मां का स्वरूप ग्रहण किया है
देख रही हूं तुम्हारी दृष्टि में
मुझमें और तुम्हारी बेटी में तुम्हें
नजर नहीं आ रहा है कोई अंतर
इसीलिए आज तुम्हारे लिए
मां का संबोधन मुझे बहुत भा रहा है
लगता है मुझे कि यह सम्बोधन
आज तुम्हारे लिए सबसे उपयुक्त है, सही है
क्योंकि आज मेरे पास सब कुछ है
लेकिन मां नहीं है
और शायद इसीलिए
मां ने पहली बार मुझे भेजा था
तुम्हें देखने के लिए।
- प्रज्ञा द्विवेदी

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगॆ
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

मुझसे मिलने को कौन विकल ?
मैं होऊँ किसके हित चंचल ?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है !
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है !

- हरिवंशराय बच्चन

पतवार

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

पेड खडे फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधुली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

कुलबुल कुलबुल नीड-नीड में
चहचह चहचह मीड-मीड में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

जागी-जागी सोई-सोई
पास पडी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमडी धारा, जैसी मुझपर-
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँख मिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम ।

- शिवमंगल सिंह सुमन