
विगत वर्ष की असीम सुभ कामनाओं, आशाओं को लेकर गत वर्ष के प्रथम प्रभात बेला मैं रवि किरणे सुभकामना, मंगलता, उत्तमता का संदेश लायें हम सब के जिन्दगी मैं..

विगत वर्ष की असीम सुभ कामनाओं, आशाओं को लेकर गत वर्ष के प्रथम प्रभात बेला मैं रवि किरणे सुभकामना, मंगलता, उत्तमता का संदेश लायें हम सब के जिन्दगी मैं..
Posted by Brijesh Thursday, January 1, 2009 at Thursday, January 01, 2009 0 comments Labels: अनुभव, चिन्तन, प्यार
#include
#include
#define Cute beautiful_lady
void main()
{
goto college;
scanf("100%",&ladies);
if(lady ==Cute)
line++;
while( !reply )
{
printf("I Love U");
scanf("100%",&reply);
}
if(reply == "GAALI")
main(); /* go back and repeat the process */
else if(reply == "SANDAL ")
exit(1);
else if(reply == "I Love U")
{
lover =Cute ;
love = (heart*)malloc(sizeof(lover));
}
goto restaurant;
restaurant:
{
food++;
smile++;
pay->money = lover->money;
return(college);
}
if(time==2.30)
goto cinema;
cinema:
{
watch++;
if(intermission)
{
coke++;
Popecorn++;
}
}
if(time ==6.00)
goto park;
}
}
{
for(time=6.30;time<= 8.30;time+=0.001)
kiss = kiss+1;
}
free(lover);
return(home);
getch();
}
Posted by Brijesh Tuesday, November 4, 2008 at Tuesday, November 04, 2008 0 comments Labels: अनुभव, प्यार, रचनाकर्म, सृजन
पति के जन्मदिन पर पत्नी उन्हें तोहफा देती थी। वहीं पति भी पत्नी के जन्मदिन पर उसे तोहफा दिया करते थे। पत्नी गृहिणी थी। जाहिर था कि वह पति से ही पैसे लेकर अपनी पसंद के तोहफे उन्हें देती थी। तोहफे देते वक्त उसके मुंह से अनायास निकलता, लीजिए, मेरी तरफ से तोहफा!
पति सोचते, पत्नी मेरे ही पैसे से मुझे मेरे जन्मदिन पर तोहफे देती है तो उसे अपना क्यों बता देती है। एक बार पति के जन्मदिन पर पत्नी ने एक शर्ट पति को प्रेजेंट की और कहा, मेरी ओर से इसे कबूल कीजिए।
पति ने कहा, मैं तुम्हें तोहफा दूं या तुम मुझे तोहफा दो, बात तो एक ही है क्योंकि दोनों तोहफों में पैसा मेरा ही लगता है। फिर दोनों में फर्क क्या है?
पत्नी को बहुत बुरा लगा। वह पति के मन में छुपे भाव को ताड गई। उसने संयम दिखाते हुए कहा, तुम्हारे और मेरे तोहफे में स्वामित्व के लिहाज से कोई फर्क नहीं है।
मगर इस लिहाज से फर्क जरूर है कि जहां तुम्हारे तोहफे में पुरुषजन्य दर्प झलकता है वहीं मेरे तोहफे में प्रेम और विनम्रता होती है। ऐसा बेबाक जवाब सुनकर पति महोदय सकपका गए।
[ज्ञानदेव मुकेश]
Posted by Brijesh Monday, July 21, 2008 at Monday, July 21, 2008 0 comments Labels: अनुभव, कहानी, चिन्तन, धर्मं, प्यार, रचनाकर्म, सृजन
अभी शादी का पहला ही साल था,
खुशी के मारे मेरा बुरा हाल था,
खुशियाँ कुछ यूँ उमड़ रहीं थी,
की संभाले नही संभल रही थी,
सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना
थोड़ा शरमाते हुए हमे नींद से जगाना,
वो प्यार भरा हाथ हमारे बालों में फिरना,
मुस्कुराते हुए कहना की डार्लिंग चाय तो पी लो,
जल्दी से रेडी हो जाओ, आप को ऑफिस भी है जाना.
घरवाली भगवन का रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग पर पूरी तरह छाई थी,
साँस भी लेते थे तो नाम उसी का होता था,
इक पल भी दूर जीना दुश्वार होता था.
*5 साल बाद*
सुबह सुबह मैडम का चाय ले कर आना,
टेबल पर रख कर ज़ोर से चिल्लाना,
आज ऑफिस जाओ तो मुन्ना को स्कूल छोड़ते हुए जाना.
एक बार फिर वोही आवाज़ आई,
क्या बात है अभी तक छोड़ी नही चारपाई,
अगर मुन्ना लेट हो गया तो देख लेना,
मुन्ना की टीचर्स को फिर ख़ुद ही संभाल लेना.
न जाने घरवाली कैसा रूप ले कर आई थी,
दिल और दिमाग पर काली घटा छाई थी,
साँस भी लेते है तो उनी का ख्याल होता है,
हर समय ज़हन में एक ही सवाल होता है,
क्या कभी वो दिन लौट के आएंगे,
हम एक बार फिर कुवारें बन पाएंगे.
Posted by Brijesh Friday, July 11, 2008 at Friday, July 11, 2008 0 comments Labels: अनुभव, कविता, प्यार, सृजन
Posted by Brijesh Saturday, May 17, 2008 at Saturday, May 17, 2008 1 comments Labels: अनुभव, चिन्तन, प्यार, सृजन
मुझे भूल जाने की बात कभी मत करना,
मुझ से रूठ जाने कि बात कभी मत करना
तू रहे बेशक मेरी नज़रो से दूर,
पर मेरे ख्वाबों मे आने से इंकार मत करना.
तेरे सिवा न चाहा है कभी किसी और को,
कोई शिकवा नही, तू चाहे कभी अपनी चाहत का इजहार मत करना.
अगर एहसास हो मेरी मोहबत का मेरे जाने के बाद,
मेरे जनाजे पे आने से इनकार मत करना.
तेरी धड़कन को चाह कर भी न छू पाया अगर,
तो मेरे लिए आंसू कभी बर्बाद मत करना.
अपने चेहरे से रूसवाई की Error तो हटाओ
ऐ जानेमन अपने दिल का Password तो बताओ
वो तो हम है जो आप की चाहत दिल मॆं रखते है
वरना आप जैसे कितने Softwares तो बाज़ार में बिकते है
रोज़ रात आप मेरे सपने में आते हो
मेरे प्यार को Mouse बना के उंगलियों पे नचाते हो
तेरे प्यार का Email मेरे दिल को लुभाता है
पर बीच में तेरे बाप का Virus आ जाता है
और करवाओगे हमसे कितना इन्तजार
हमारे दिल की साईट पे कभी Enter तो मारो यार
अपने इन्सल्ट का बदला देखो कैसे लुंगा
जानेमन तेरे बाप को Ctrl+Alt+Delete कर दुंगा
आपके कई नखरे अपने दिल पे बैंग हो गये
दो PC जुड़ते जुड़ते Hang हो गये
आप जैसो के लिये दिल को Cut किया करते है
वरना बाकी केसेस में तो Copy Paste किया करते हैं
आपक हँसना आप क चलना आप की वो स्टाईल
आपकी अदाओं की हमने Save कर ली है File
जो सदीयों से होता आया है वो रीपीट कर दुंगा
तु ना मिली तो तुझे Ctrl+Alt+Delete कर दुंगा
लड़कीयां सुन्दर हैं और लोनली हैं
प्रोब्लम है कि बस वो Read Only है
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
सत्य हो यदि, कल्प की भी कल्पना कर, धीर बांधूँ,
किन्तु कैसे व्यर्थ की आशा लिये, यह योग साधूँ !
जानता हूँ, अब न हम तुम मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
आयेगा मधुमास फिर भी, आयेगी श्यामल घटा घिर,
आँख भर कर देख लो अब, मैं न आऊँगा कभी फिर !
प्राण तन से बिछुड़ कर कैसे रहेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
अब न रोना, व्यर्थ होगा, हर घड़ी आँसू बहाना,
आज से अपने वियोगी, हृदय को हँसना सिखाना,
अब न हँसने के लिये, हम तुम मिलेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
आज से हम तुम गिनेंगे एक ही नभ के सितारे,
दूर होंगे पर सदा को, ज्यों नदी के दो किनारे,
सिन्धुतट पर भी न दो जो मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
तट नदी के, भग्न उर के, दो विभागों के सदृश हैं,
चीर जिनको, विश्व की गति बह रही है, वे विवश हैं !
आज अथइति पर न पथ में, मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
यदि मुझे उस पार का भी मिलन का विश्वास होता,
सच कहूँगा, न मैं असहाय या निरुपाय होता,
किन्तु क्या अब स्वप्न में भी मिल सकेंगे ?
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
आज तक हुआ सच स्वप्न, जिसने स्वप्न देखा ?
कल्पना के मृदुल कर से मिटी किसकी भाग्यरेखा ?
अब कहाँ सम्भव कि हम फिर मिल सकेंगे !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
आह! अन्तिम रात वह, बैठी रहीं तुम पास मेरे,
शीश कांधे पर धरे, घन कुन्तलों से गात घेरे,
क्षीण स्वर में कहा था, "अब कब मिलेंगे ?"
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
"कब मिलेंगे", पूछ्ता मैं, विश्व से जब विरह कातर,
"कब मिलेंगे", गूँजते प्रतिध्वनिनिनादित व्योम सागर,
"कब मिलेंगे", प्रश्न उत्तर "कब मिलेंगे" !
आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे ?
- पं. नरेन्द्र शर्मा
जिधर भी देखती हूँ तन्हाई नज़र आती है
आपके इंतज़ार में हर शाम गुज़र जाती है
मैं कैसे करूं गिला दिल के ज़ख्मों से हुज़ूर
आंसू छलकते हैं मेरी सूरत निखर जाती है
तोड़ दिए हैं मैंने अपने घर के सारे आईने
मेरी रूह मेरा ही चेहरा देख के डर जाती है
रो के हलके हो लेते हैं ज़रा से तेरी याद में. ...
ज़रा सी ना-मुरादों कि तबियत सुधर जाती है
असर करती यकीनन ग़र छू जाती उनके दिल को लेकिन
अफ़सोस के आह मेरी फ़िज़ाओं ही में बिखर जाती है
मैकदे में जब भी ज़िक्र आता है तेरे नाम का
शाम कि पी हुई सर ए-शाम ही उतर जाती है
कभी आ के मेरे ज़ख्मों से मुकाबला तो कर
ए ख़ुशी तू मुहँ छुप्पा के किधर जाती है
तुझे इन्ही काँटों पे चल के जान होगा
उनके घर को बस यही ऐक रहगुज़र जाती है .......
वीरान सी इस जिन्दगी में जब दोस्ती आपकी मिली, 
लगा हमारी जिन्दगी भी अब है फिर से खिली.
आपकी मासूमियत पे हुवे हम फ़िदा,
चाहते रहेंगे आपको हम सदा.
भले ही चेहरा गए आपका भूल,
भा गए हमको आपके उसूल.
दोस्ती कब बदली मोहब्बत में पता यह ना चला,
जानता नही जो कर रहा हूँ वो बुरा है या भला.
रोकनी चाहि हमने यह चाह,
फिर लगा प्यार ही तो किया ना कोई गुनाह.
बेंतेहा करते है आपसे प्यार,
जिसका करते है हम आज इजहार.
अब तो हमारी है एक ही ख्वाहिश,
गौर करे हमारी आप यह गुजारिश.
सोच कर तो देखो इस बारे में ए हंसिनी,
क्या आप बनेंगे हमारी जीवन संगिनी ..................
बृजेश खंतवाल
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